मालिक कौन है?’ महाराज जयसिंह की बात का जवाब अभी सिद्धनाथ बाबा ने नहीं दिया था कि सामने से वनकन्या आती दिखाई पड़ी। दोनों बगल उसके दो सखियाँ और पीछे-पीछे दस-पंद्रह लौंडियों की भीड़ थीं। बाबा जी – (वनकन्या की तरफ इशारा करके) ‘इस जगह की मालिक यही हैं।’ सिद्धनाथ बाबा की बात सुन कर दोनों महाराज और ऐयार लोग, ताज्जुब से वनकन्या की तरफ देखने लगे। इस वक्त कुँवर वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह भी हैरान हो वनकन्या की तरफ देख रहे थे। सिद्धनाथ की जुबानी यह सुन कर कि इस जगह की मालिक यही है, कुमार और तेजसिंह को पिछली बातें याद आ गईं। कुँवर वीरेंद्रसिंह सिर नीचा कर सोचने लगे कि बेशक कुमारी चंद्रकांता, इसी वनकन्या की कैद में है। वह बेचारी तिलिस्म की राह से आ कर जब इस खोह में फँसी तब इन्होंने कैद कर लिया, तभी तो इस जोर की खत लिखा था कि बिना हमारी मदद के तुम कुमारी चंद्रकांता को नहीं देख सकते, और
तेज-अच्छी खबर है। कुमार-कुछ कहोगे भी कि इसी तरह? तेज-आप सुन के क्या कीजिएगा? कुमार-क्या मेरे सुनने लायक नहीं है? तेज-आपके सुनने लायक क्यों नहीं है मगर अभी न कहेंगे। कुमार-भला कुछ तो कहो? तेज-कुछ भी नहीं। देवी-भला ओस्ताद हमें भी बताओगे या नहीं? तेज-क्या तुमने ओस्ताद कहकर पुकारा इससे तुमको बता दें? देवी-झख मारोगे और बताओगे! तेज-(हंसकर) तुम कौन-सा जस लगा आए पहले यह तो कहो? देवी-मैं तो आपकी शागिर्दी में बट्टा लगा आया।