बाबा जी ने उसके चेहरे पर से एक झिल्ली जैसी कोई चीज जो तमाम चेहरे के साथ चिपकी हुई थी खींच ली और हाथ पकड़ कर महाराज जयसिंह के पैर पर डाल दिया और कहा – ‘लीजिए यही आपकी चंद्रकांता है।’ चेहरे पर की झिल्ली उतर जाने से सबों ने कुमारी चंद्रकांता को पहचान लिया, महाराज जयसिंह पैर से उसका सिर उठा कर देर तक अपनी छाती से लगाए रहे और खुशी से गद्गद् हो गए। सिद्धनाथ योगी ने उसकी दोनों सखियों के मुँह पर से भी झिल्ली उतार दी। लाल पोशाक वाली चपला और सब्ज पोशाक वाली चंपा साफ पहचानी गईं। मारे खुशी के सबों का चेहरा चमक उठा, आज की-सी खुशी कभी किसी ने नहीं पाई थी। महाराज जयसिंह के इशारे से कुमारी चंद्रकांता ने राजा सुरेंद्रसिंह के पैर पर सिर रखा, उन्होंने उसका सिर उठा कर चूमा। घंटों तक मारे खुशी के सभी की अजब हालत रही। कुँवर वीरेंद्रसिंह की दशा तो लिखनी ही मुश्किल है। अगर सिद्धनाथ योगी इनको
आपसे ऐयारी या दगा न करेगा और आप भी इस बात का ख्याल रखें। -आपका शिवदत्त।” इस खत को सुनकर सब खुश हो गए। कुमार ने हुक्म दिया कि पंडित बद्रीनाथजी, जो हमारे यहां कैद हैं लाये जावें। जब वे आये कुमार के इशारे से उनके हाथ-पैर खोल दिए गए। उन्हें भारी खिलअत पहिराकर दीवान साहब के हवाले किया और हुक्म दिया कि आप दो रोज यहां रहकर चुनार जायें। फतहसिंह को उनकी मेहमानी के लिए हुक्म देकर दरबार बर्खास्त किया। चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : नौवां बयान) जब दरबार बर्खास्त हुआ आधी रात जा चुकी थी। फतहसिंह