पहले ही कुमारी से न मिलाए रहते तो इस समय इनको शर्म और हया कभी न दबा सकती, जरूर कोई बेअदबी हो जाती। महाराज जयसिंह की तरफ देख कर सिद्धनाथ बाबा बोले – ‘आप कुमारी को हुक्म दीजिए कि अपनी सखियों के साथ घूमे-फिरे या दूसरे कमरे में चली जाए और आप लोग इस पहाड़ी और कुमारी का विचित्र हाल मुझसे सुनें।’ जयसिंह – ‘बहुत दिनों के बाद इसकी सूरत देखी है, अब कैसे अपने से अलग करूँ, कहीं ऐसा न हो कि फिर कोई आफत आए और इसको देखना मुश्किल हो जाए।’ बाबा जी – (हँस कर) ‘नहीं, नहीं, अब यह आपसे अलग नहीं हो सकती।’ जयसिंह – ‘खैर, जो हो, इसे मुझसे अलग मत कीजिए और कृपा करके इसका हाल शुरू से कहिए।’ बाबा जी – ‘अच्छा, जैसी आपकी मर्जी।’ चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : उन्नीसवां बयान) महाराज जयसिंह और सुरेंद्रसिंह के पूछने पर सिद्धनाथ बाबा ने इस दिलचस्प
दीवान साहब को लेकर अपने खेमे में गये। थोड़ी देर बाद कुमार के खेमे में तेजसिंह,देवीसिंह, और ज्योतिषीजी फिर इकट्ठे हुए। उस वक्त सिवाय इन चारों आदमियों के और कोई वहां न था। कुमार-क्यों तेजसिंह, बुढ़िया की बात तो ठीक निकली! तेज-जी हां, मगर महाराज शिवदत्त की खत से तो कुछ और ही बात पाई जाती है। देवी-उसके लिखने का कौन ठिकाना, कहीं वह धोखा न देता हो। ज्यो-इस वक्त बहुत सोच-विचारकर काम करने का मौका है। चाहे शिवदत्त कैसी ही सफाई दिखाए मगर दुश्मन का विश्वास कभी न करना चाहिए। तेज-आप