नहीं मालूम होता तबीयत की घबराहट नहीं मिटती, इस पर आप कई दफा कह चुके हैं कि मैं योगी महात्मा नहीं हूँ, यह सुन कर हम लोग और भी घबरा रहे हैं कि अगर आप वह नहीं हैं जो सूरत से जाहिर है तो फिर कौन हैं।’ बाबा जी – ‘खैर, यह भी मालूम हो जाएगा।’ जयसिंह – (कुमारी चंद्रकांता की तरफ देख कर) ‘बेटी, क्या तुम भी नहीं जानतीं कि यह योगी कौन हैं?’ चंद्रकांता – (हाथ जोड़ कर) ‘मैं तो सब-कुछ जानती हूँ मगर कहूँ क्यों कर, इन्होंने तो मुझसे सख्त कसम खिला दी है, इसी से मैं कुछ भी नहीं कह सकती।’ बाबा जी – ‘आप जल्दी क्यों करते हैं। अभी थोड़ी देर में मेरा हाल भी आपको मालूम हो जाएगा, पहले चल कर उन चीजों को तो देखिए जो कुमारी चंद्रकांता को इस तिलिस्म से मिली हैं।’ जयसिंह – ‘जैसी आपकी मर्जी।’ बाबा जी उसी वक्त उठ खड़े हुए और सभी को साथ ले, दूसरे बाग की तरफ चले। चन्द्रकान्ता
बात नजर पड़ जाय।” यह कहकर तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी कुमार से बिदा हो गश्त लगाने चले गये। कुमार भी कुछ भोजन करके पलंग पर जा लेटे। नींद काहे को आनी थी, पड़े-पड़े कुमारी चंद्रकान्ता की बेबसी, वनकन्या की चाह, और बुङ्ढी चुडैल की शैतानी को सोचते-सोचते आधी रात से भी ज्यादे गुजर गई। इतने में खेमे के अंदर किसी के आने की आहट मिली, दरवाजे की तरफ देखा तो तेजसिंह नजर पड़े। बोले, “कहो तेजसिंह, कोई नई खबर लाये क्या!” तेज-हां एक बढ़िया चीज हाथ लगी है? कुमार-क्या है? कहां है? देखूं। तेज-खेमे के